भूली-बिसरी कला

                    पटना कलम- जब कागज़ पर उतरा बिहार

जब भी मैं  कागज़ और ब्रश उठाती हूँ तो रंग मेरी आत्मा से बातें करने लगती हैं ,लेकिन कुछ कलाएँ ऐसी होती हैं, जो सिर्फ रंगों से नहीं, बल्कि इतिहास, परंपरा और भावनाओं से जीवित हैं। आज हम आपको एक ऐसे कला के बारे में बताएंगे जो न सिर्फ एक कला है बल्कि एक विरासत है जो सैकड़ों साल पुरानी होते हुए भी आज भी जीवित है 





भारतीय चित्रकला में से एक अनोखी कला जो कि न केवल बिहार बल्कि पूरे भारत अपने संस्कृतियों को दर्शाती है वो पटना कलम चित्रकला है, ये चित्रकला शैली  18वी और 19 वीं शताब्दी में विकसित हुआ था, यह दुनिया की पहली चित्रकला शैली थी जिसने आमलोगों के जन-जीवन को अपनी कला में जगह दी,  इस कला में बारीक ब्रश और हल्के रंगों का इस्तेमाल किया जाता है,जो आम लोगों की जिंदगी, व्यापार, त्यौहार और राजदरवारों की कहानियां दर्शाती है

आइए जानते है इस कला को विस्तार से-

पटना कलम जिसको पटना स्कूल ऑफ पेंटिंग या  कंपनी पेंटिंग के नाम से जाना जाता है। इस चित्रकला शैली की उत्पत्ति भारत के पटना जिले में हुई,यह अपनी छोटी-छोटी पेंटिंग्स के लिए जानी जाती है,जिसमें आम लोगों की जिंदगी उनके रोजमर्रा के काम, स्थानीय त्यौहार , समारोहों पर केंद्रित होता है

पटना कलम का ऐतिहासिक वर्णन-

ईबी हैवेल की  इंडियन स्कल्पचर एंड पेंटिंग किताब में पटना कलम का पहला अलक्षित उल्लेख आया था।लेकिन उसमें पटना के चित्रकारों का कोई जिक्र नहीं किया गया था। बाद में पर्सी ब्राउन ने अपनी किताब इंडियन पेटिंग अंडर द मुगल्स में दिया था और फिर एन. सी मेहता की स्ट्डीज इन इंडियन पेटिंग और राय कृष्ण दास की भारत की चित्रकला में भी इसके संदर्भ छपे। पटना कलम का प्रारंभिक चित्रकार मुगल शासन काल से माना जाता है।लेकिन जैसे ही मुगल शासन काल का अंत होने लगा, तो चित्रकारों के कई दल दिल्ली शहर छोड़कर आजीविका की खोज में देश के विभिन्न शहरों में निकल पड़े। क्योंकि दिल्ली में उनके सम्मान और बेहतरीन चित्र शैली पर पुरस्कृत करने वाला कोई नहीं बचा था।

उनमें से कुछ चित्रकार मुर्शिदाबाद चले गए। जहां से बाद में अधिकतम कलाकार सन 1760 के आसपास में मच्छरहट्टा (पटना सिटी) चौक, दीवार और मोहल्ला में आ बसे। तब पटना आर्थिक दृष्टिकोण से संपन्न शहर हुआ करता था। यहां भी राजे रजवाड़े चित्र शैली के शौकीन हुआ करते थे, जिनके द्वारा उन चित्रकारों को सम्मानित भी किया जाने लगा और चित्र शैली में विस्तार भी देखा गया।