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cinema and fashion

 सिनेमा और फैशन ट्रेंड: फिल्मों से बदलते स्टाइल स्टेटमेंट सिनेमा सिर्फ एक मनोरंजन का माध्यम नहीं है; यह समाज, संस्कृति और फैशन पर गहरा प्रभाव डालता है। जब भी कोई फिल्म सुपरहिट होती है, उसके किरदारों का स्टाइल, पहनावा और हेयरस्टाइल तेजी से ट्रेंड में आ जाता है। युवाओं के लिए फिल्मों से प्रेरित फैशन सिर्फ एक स्टाइल स्टेटमेंट नहीं, बल्कि उनकी पर्सनैलिटी और एटिट्यूड का हिस्सा बन जाता है।  1– सिनेमा का फैशन पर असर 1950-60 के दशक में मधुबाला, नर्गिस और राजकपूर जैसे सितारों का फैशन लोगों के दिलों पर राज करता था। साड़ियों की खूबसूरती, काजल से भरी आंखें और रेट्रो स्टाइल ग्लैमरस माने जाते थे। फिर 70-80 के दशक में अमिताभ बच्चन के फ्लेयर्ड पैंट्स, जंपसूट्स और रेखा की सिल्क साड़ियों ने धूम मचा दी। 2. 90’s और 2000’s – बॉलीवुड फैशन का नया दौर राज और सिमरन (DDLJ) – शाहरुख खान के लेदर जैकेट और काजोल के पंजाबी सूट हर युवा की पसंद बन गए। कुछ कुछ होता है (1998) – काजोल का बॉयकट हेयर और शाहरुख का 'cool' लिखा हुआ चेन वाला पेंडेंट युवाओं में ट्रेंड बन गया। 3. मॉडर्न सिनेमा और फैशन – सोशल मीडिया का प...

भूली-बिसरी कला

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                     पटना कलम- जब कागज़ पर उतरा बिहार जब भी मैं  कागज़ और ब्रश उठाती हूँ तो रंग मेरी आत्मा से बातें करने लगती हैं ,लेकिन कुछ कलाएँ ऐसी होती हैं, जो सिर्फ रंगों से नहीं, बल्कि इतिहास, परंपरा और भावनाओं से जीवित हैं। आज हम आपको एक ऐसे कला के बारे में बताएंगे जो न सिर्फ एक कला है बल्कि एक विरासत है जो सैकड़ों साल पुरानी होते हुए भी आज भी जीवित है  भारतीय चित्रकला में से एक अनोखी कला जो कि न केवल बिहार बल्कि पूरे भारत अपने संस्कृतियों को दर्शाती है वो पटना कलम चित्रकला है, ये चित्रकला शैली  18वी और 19 वीं शताब्दी में विकसित हुआ था, यह दुनिया की पहली चित्रकला शैली थी जिसने आमलोगों के जन-जीवन को अपनी कला में जगह दी,  इस कला में बारीक ब्रश और हल्के रंगों का इस्तेमाल किया जाता है,जो आम लोगों की जिंदगी, व्यापार, त्यौहार और राजदरवारों की कहानियां दर्शाती है आइए जानते है इस कला को विस्तार से- पटना कलम जिसको पटना स्कूल ऑफ पेंटिंग या  कंपनी पेंटिंग के नाम से जाना जाता है। इस चित्रकला शैली क...

मेरी कलाकृति की दुनिया

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                                                                मेरी कलाकृति की दुनिया                                                                     द आर्ट ग्लोरियस    कला एक ऐसी भाषा है जो शब्दों की सीमाओं को लांघकर दिल की गहराइयों तक पहुँचती है। मेरी कलाकृति की दुनिया भी कुछ ऐसी ही है—जहाँ हर रंग, हर रेखा और हर आकृति मेरी भावनाओं की कहानी कहती है। यह केवल एक चित्रण नहीं, बल्कि एक अनुभव है जो हर बार नया रूप धारण कर लेता है। जब भी मन उदास होता है, तो मैं अपने ब्रश को उठाकर कैनवास पर अपनी भावनाओं को उकेरती हूँ। यह प्रक्रिया मेरे लिए सिर्फ रंगों का मेलजोल नहीं, बल्कि आत्मा की गहराइयों तक जाने वाला एक सफर  है। उदासी के लम्हों में मेरे रंग और भी ...

महाकुंभ - एक पवित्र संगम

                                                                 महाकुंभ - एक पवित्र संगम महाकुंभ यानी अमरत्व का मेला। विश्व और सनातन धर्म का सबसे बड़ा धार्मिक और सांस्कृतिक मेला मना जाता है, जो हर 12 साल में चार पवित्र स्थलों - प्रयागराज, हरिद्वार, नासिक और उज्जैन में आयोजित होता इस साल का महाकुंभ  एक ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है इस साल महाकुंभ मेला की विशेष बात ये है कि यह मेला  144 वर्षों में एक बार आयोजित होता है इस साल प्रयागराज में 13 जनवरी से ही भव्य महाकुंभ मेले की आयोजन हो चुकी है और 26 फरवरी यानी महा शिवरात्रि तक चलेगा ,इस मेले में देश विदेश से  लाखों श्रद्धालु और साधु संत पवित्र स्नान करने आ रहे है, महाकुंभ के दौरान सभी पवित्र त्रिवेणी में (गंगा, यमुना, सरस्वती)  में लोग आस्था भाव से डुबकी लगाते है। इस बार महाकुम्भ में आने वाले श्रद्धालु ने ऐसी भीड़ की है जिससे जानके आप हैरान हो ...

EDUCATION BEYOND BOUNDARIES

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एसटीईएम शिक्षा/सीमाविहीन शिक्षा सीखना एक कभी न खत्म होने वाली और हमेशा विकसित होने वाली प्रक्रिया है जिसमें ज्ञान प्राप्ति की कला शामिल है|एक माध्य या मध्यिका एक बार सटीकता और निरपेक्षता के साथ दोहराव के कार्य को सीख लेने के बाद मोड के अधीन हो जाती है। शिक्षा समाज की शिक्षाओं के माध्यम से प्रचार करने और अंततः प्रगतिशील राष्ट्र का हिस्सा बनने के लिए एक माध्यम के रूप में कार्य करती है। विकास का अंतिम लक्ष्य हमेशा एक ही रहता है, जिसमें ध्वजवाहक का टैग हमेशा छात्रों के साथ होता है, चाहे वह किसी भी पीढ़ी का हो। विकल्पों के बोझ को कम करना क्यों आवश्यक है, यह समय का सवाल है जिसका उत्तर उनमें से बहुत से कार्यान्वयन के साथ ही मिल जाना चाहिए। एक बच्चा एक ऐसे वातावरण में जन्म लेता है, जिस पर कोई बंधन नहीं होता, जहाँ उसे अवलोकन, समझ और अंततः सीखने का कौशल सिखाया जाता है। फिर बच्चा बुनियादी भावनाओं, अच्छाई और बुराई के गुणों और सामाजिक व्यवहार के गुणों को बिना किसी को चुने ही अपने अंदर समाहित कर लेता है। किशोरावस्था की उम्र भी इससे अलग नहीं है और एक युवा क्या सीख सकता है और अपने जीवन में क्या हासिल ...

meri apni soch

 सुनो सबकी.... करो अपने मन की... अकसर हम ये सोचते है कि चार लोग क्या कहेंगे और इसी सोच के वजह से हम अपनी सोच नहीं रख पाते है और न ही उससे अपने पर्सनल लाइफ में इस्तेमाल कर पाते है,हमारे जीवन में हर कोई सलाह देता है जैसे माता पिता,दोस्त, रिश्तेदार, यहां तक कि अंजान लोग भी जिनसे हम सांयोगिक मिलते है,हर कोई अपने अनुभवों, धारणाओं और सोच के आधार पर हमें सही और गलत का पाठ पढ़ाता है। लेकिन क्या सच में हमें हर किसी की बात माननी चाहिए? या फिर अपने दिल की बात सुननी चाहिए? कहा जाता है कि इस दुनिया में हम अकेले आए थे और अकेले ही चले जाएंगे, किसी का साथ बस इन दोनों  सफर के बीच में ही रहता है और इस सफर में कई मोड़ भी आते है जिसे हमें पार करना होता है और अपने लक्ष्य की ओर बढ़ना होता है। हमारे मन में ये सवाल आता है कि आखिर हम लोगों की बात सुनते क्यों है आखिर सुनना जरूरी क्यों है, तो इसका जवाब मेरे हिसाब से यह है कि सुनना एक कला है। जब हम दूसरों की बातें सुनते है तो हमें कई तरह के विचार, अनुभव, दृष्टिकोण मिलते है। यह हमें चीजों को नए नज़रिए से देखने और समझने में मदद करता है। कभी कभी ऐसा होता है...

पशु -एक बेजुबान प्राणी

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                          पशु -एक बेजुबान प्राणी क्या आप भी मेरी तरह एक जानवर प्रेमी है? अगर है तो कैसा  महसूस होता है जब आप किसी जानवर को सड़क पर घायल चाहे वो गाय, भूखा कुत्ता या कोई और ही जानवर क्यों न हो देखते होंगे। दुनिया भर में हर साल करोड़ों जानवर क्रूरता का शिकार होते है,जैसे कभी मनोरंजन में इस्तेमाल किए जाते है,कभी फैशन के लिए तो कभी सिर्फ इंसानी स्वार्थ के लिए। हम इंसान तो  भूल ही गए है कि जानवर भी हमारे भगवान के ही अनमोल देन है l पर्यावरण का हिस्सा है। हम इंसान तो मानो उन्हें अपनी पर्सनल प्रॉपर्टी के तौर पे इस्तेमाल करते है। लेकिन क्या हम इस जानवर क्रूरता को रोक सकते है? आइए जानते है इस ब्लॉग में! हमारे समाज में कई तरह के जानवरों पे अत्याचार और बुरा व्यवहार किया जाता है उसे (animal cruelty) कहा जाता है। ये कई रूपों में हो सकता है जैसे पालतू जानवर पर अत्याचार, अपने मनोरंजन के लिए उन्हें पत्थर से मारना, भूखा रखना, घोड़ों या बेलो पे बहुत ज्यादा बोझ देके उन्हें कई किलोमीटर तक चलवाना और भी बहुत सारे अत्याचा...